राष्ट्र जागृति के महान गीत को न भूलें (डॉ प्रदीपसिंह राव)
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राष्ट्र जागृति के महान गीत को न भूलें (डॉ प्रदीपसिंह राव)
Update24c.in:-
रतलाम।मॉर्निंग स्टार हायर सेकंड्री स्कूल ,सी बी एस ई जावरा रोड द्वारा "राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की वर्तमान समाज में राष्ट्र जागृति के लिए उपयोगिता" विषय पर व्याख्यान रखा गया।विशेष अतिथि एवं मुख्य वक्ता पूर्व प्राचार्य वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रदीपसिंह राव थे। आपने बच्चों को राष्ट्रीय महत्व के गीत गा कर उनके साथ समवेत स्वर में भागीदारी की।आपने वंदे मातरम को राष्ट्र की धड़कन निरुपित किया और इतिहास बताते हुए कहा कि,1857की क्रांति के दमन के बाद क्रांतिकारियों को 90वर्ष तक किसी नारे ने सबसे अधिक आंदोलित किया तो वो था 1905में घर घर गूंजता नारा,,वंदे! मातरम्!! बंगाल विभाजन की कोख से जन्मे इस नारे ने अंग्रेजों की चूलें हिला दीं।बंकिम चंद चट्टोपाध्याय ने इसे 1875में तब लिखा जब अंग्रेजों ने भारतीयों और बंग प्रेमियों पर घोर अत्याचार किए।
ऐतिहासिक आनंद मठ की रचना:-

जब अंग्रेजों ने बंग भंग के विरोधियों को कुचलना शुरू किया तो बंकिमचंद ने आनंद मठ उपन्यास की रचना की और उसमें 1882में वंदे मातरम गीत प्रकाशित किया।योद्धा सन्यासियों के अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध इस कथानक ने पूरे देश में धूम मचा दी।बाद में अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया।तब यह भूमिगत रूप से खूब प्रचारित हुआ और क्रांतिकारियों का विरोध का माध्यम बन गया। 1905में अंग्रेजों ने अपना राष्ट्र गान, "गॉड सेव द क्वीन "भारत पर थोपा तो और विरोध बढ़ गया। बाद में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में गाया।इसके पूरे छह छंद गाए जाते रहे ।बाद मे मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण इसके चार पद हटा दिए गए,जो विभाजन की जड़ बन गए। तब तक देश एकता के सूत्र में बंध चुका था और हर क्रांतिकारी वंदे मातरम कर रहा था।
मध्य भारत प्रांत,प्रदेश में वंदे मातरम की घर घर में गूंज:-

मध्य भारत में वंदे मातरम का तराना राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन चुका था ।इंदौर के एक संग्रहालय में आज भी वो सारे प्रतीक रखे हैं जिन्हें पहन कर क्रांतिकारी वंदे मातरम गीत गाते जुलूस निकालते थे।आनंद मठ की प्रतियां,भूमिगत पर्चे,झंडे बैनर और कई प्रतीक सुरक्षित हैं। 1906में बंगाल से वंदे मातरम नाम का एक राष्ट्रवादी अखबार भी निकला था,,जो भूमिगत हो गया था । 2023में विश्व सर्वेक्षण में 70000 गीतों में से वंदे मातरम श्रेष्ठ 10गीतों में चयनित हुआ था । दुनिया के सबसे लोकप्रिय दूसरे नंबर के इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने पर हम इसके सम्मान में अपना सर्वस्व न्योछावर करें,यही राष्ट्र स्वाभिमान है।
बच्चों ने दी शहादत:-

डॉ राव ने रोचक इतिहास बताते हुए कहा कि इस संग्राम में वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए छोटे छोटे बच्चों ने प्राणों का उत्सर्ग किया। इनमें बाजी राऊत 12वर्ष,ब्रह्मचंद विद्यार्थी 13वर्ष,,कनकलता 17वर्ष और बंगाल के खुदीराम बोस 18वर्ष को राष्ट्र कभी न भूले। उनके होठों पर अंतिम नारा था,वंदे मातरम्!!
400 बच्चों ने वंदे मातरम के लिए की भागीदारी;-

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था अध्यक्ष कार्ल वार्ड एवं उपाध्यक्ष आर्थर वार्ड ने दीप प्र ज्वलन के साथ किया।ग्राहक पंचायत के मालवप्रांत अध्यक्ष अनुराग लोखंडे ने विशेष अतिथि की आसंदी से स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया।वरिष्ठ अभिभाषक वीरेंद्र पाटीदार ने वंदे मातरम के चंदन की विवेचना पर प्रकाश डाला।शिक्षक लगन शर्मा ने गीत का हिंदी अनुवाद करते हुए मैथिलीशरण की कविता सुनाकर भूमिका बनाई।संचालन मंजुला गहलोत ने किया।वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित इस महती समारोह में 400से अधिक विद्यार्थी और स्टाफ के सदस्य शामिल हुए।सभी ने संपूर्ण वंदे मातरम गीत को एक स्वर में गाया।