बिहार : किसकी जीत और किसकी हार?( बिहार चुनाव एक विश्लेषण) : डॉ प्रदीप सिंह राव

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बिहार : किसकी जीत और किसकी हार?( बिहार चुनाव  एक विश्लेषण)  :  डॉ प्रदीप सिंह राव

बिहार :किसकी जीत और किसकी हार?(बिहार चुनाव एक विश्लेषण: डा प्रदीपसिंह राव)

Update24x.in :- 


रतलाम । बिहार  में चुनाव की तैयारी है और  एडी  चोटी का दम  लगाने राजनीतिक दल मैदान में कूद पड़े हैं। मतदान के पहले के ये अंतिम क्षण हैं।आज बिहार बदल चुका है,यहां20/25साल पहले जैसी अराजक स्थिति नहीं है। बूथ कैप्चरिंग ,हिंसा, लूट,हत्या से  अब चुनाव नहीं होते(हालांकि बाहुबलियों का धुंधला प्रभाव आज भी है)बिहारी रणनीति  में  अब हाई टेक चुनाव लड़े जाते हैं।    

 (मुद्दे  बदल गए हैं  अब)            

अब  मत पेटियों की लूटपाट  का जमाना चला गया।चारा , भैंसे और विभिन्न घोटाले भूली बिसरी बातें हो गई।अब कुछ सरकार की दी गई सुविधाओं और भविष्य के लाभ का खेल होता है।जातिगत समीकरण सर्वोपरि है।बेरोजगारी का मुद्दा हरा का हरा बना हुआ है लीकिन युवा वोटर्स भी बटा हुआ है।बिहार में किसी भी एक नेता की लोकप्रियता नहीं है,जैसी एक   समय में कर्पूरी ठाकुर,जगन्नाथ मिश्र,बलिराम भगत, लालू यादव,पासवान जैसे नेताओं का जादू चलता था।अब लालू यादव परिवार से तेजस्वी यादव ने छवि  थोड़ी अच्छी चमकाई है लेकिन चाचा नीतीश के साथ मोदी जी के खड़े रहने से उनकी  तेजस्वी की चमक फीकी पड़ जाती हैl राजद को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नाव पर    सवारी करनी पड़ी  जो मोदी के  "अर्जुन "नीतीश के मुकाबले बहुत  फीकी  सवारी है।फिर  पिछली बार भी 243में से राजद ने 80सीटें हासिल कर ली थी।उनका महागठबंधन  कुछ फेल हो गया था,,आज भी कमोबेश  वैसी ही स्थिति लगती है। 

(सपनों के खजाने...!)

पिछली बार जेडीयू,भाजपा,लोजपा और अन्य के साथ एनडीए ने,130सीटों पर जीत हासिल की थी।महागठबंधन 109पर  रुका हुआ था।बीजेपी,54 सीटों के साथ तीसरी बड़ी पार्टी बनी थी । 

   अब इस विधान सभा चुनाव की नई रणनीति चल रही है। घोषणाओं की   "रेवड़ी "बट रही है, "सपनों के खजाने "लुटाए जा रहे हैं।पिछड़ों , ओबीसी पर सारा दारोमदार है वो भी जदयू और राजद में  बटे हुए हैं।प्रशांत किशोर 243सीटों पर चुनाव लड़वा रहे हैं जो किसी भी दल का खेल बिगाड़ सकते हैं।लोजपा और अन्य दलों का भी अब सीटों का बटवारा नए रूप दिखाएगा।हवा विपरीत बहती सी दिख रही है जो बीजेपी की सरकार बनाने में आड़े आ सकती है।

(कांग्रेस की साख दांव पर)

मजबूत पक्ष ये है कि कांग्रेस अभी भी बिहार में कमजोर ही है।रेवड़ी बांटने के लिए नीतीश के पास बड़ा खजाना है।जबकि यादव परिवार (राजद )सिर्फ मुंगेरी लाल के सपने दिखा सकता है।  इस बार धारा के विपरीत  तैरने का साहस दिखाने वाले दल की ही जीत होगी।लेकिन इस सत्ता परिवर्तन के लिए एडी  से चोटी का दम भी लगा हुआ है।प्रशांत किशोर और राहुल गांधी की पार्टियों के लिए यह साख का प्रश्न है।किसी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ तो सिर्फ ये दो ही दिखाई दे रहे हैं।तेजस्वी की सरकार बनती है तो राहुल की  बिहार में डूबती पार्टी में पैबंद तो लग ही जाएगा।ऊंट किस करवट बैठेगा यह युवा मतदाताओं के 52%से अधिक मतदान होने पर ही तय होगा।अभी तो नेक टू नेक ही नतीजे  निकलते लगते हैं। त्रिशंकु परिणाम अधिक संभावित हैं।