कथाकार हों या पत्रकार कभी न भूल सकेंगे इंदौर का खजुरी बाजार: (डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ लेखक)।

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कथाकार हों या पत्रकार कभी न भूल सकेंगे इंदौर का खजुरी बाजार: (डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ लेखक)।

Update24x.in,:-

रतलाम। अपने 75वर्ष पूर्ण होने पर नई दुनिया ने "इतिहास के झरोखे से " श्रखंला में इंदौर के बाजारों का इतिहास प्रकाशित किया था।इसके पहले भी इतिहासकारों के लेख इंदौर के अखबारों में छपते रहे जो संग्रहालयों में पढ़ने  को मिल जाते हैं,बशर्ते आप को इतिहास जानने का शौक हो।  हालांकि इंदौर में पहला अखबार ही 1849में मालवा अखबार,होलकर स्टेट के समय  आया,तब उसमें बाजार की खबरें छपती थीं। लेकिन उसके भी  पहले  से  इंदौर में  1716में ही इंदौर में व्यापार शुरू हो चुका था।नंदलाल पुरा इंदौर की पहली व्यापारिक बस्ती बनी थी।" माय सिटी माय हेरिटेज इंदौर" में दस्तावेज पढ़ना मिल जाते हैं,जिसे इंदौर के स्थानीय इतिहासकारों,जैसे राजेंद्र सिंह ,और जफर अंसारी साहब ने संजोया और संग्रहालय में रखवाया।   सराफा का इतिहास भी 300वर्ष पुराना है।  

राज बाड़ा  के  निर्माण के  बाद फैला इंदौर का व्यापार:- 

     सन 1774 में राजबाड़ा के निर्माण के पहले इंदौर में व्यापार बिखरा हुआ था। 1734 में इंदौर का सबसे पुराना मल्हार राव द्वारा निर्मित शिविर बना,जो "मल्हारगंज 'के नाम से प्रसिद्ध हुआ।राज बड़ा से भी पहले मल्हारगंज बना और उसके भी पहले सबसे प्राचीन व्यापार  का केंद्र बना था । जूनी इंदौर,, यह ख़ान, कान्हा नदी के किनारे घाट पर व्यापार होता था ,व्यापारी नावों ,ढोंगियों से आते थे।कालांतर में राजबाड़े के विकास के साथ ही इसके आसपास इंदौर की रौनक फैलती गई और इसके आसपास ही व्यापार केंद्र स्थापित होते गए।हर बाजार हर गली,हर मोहल्ले के रोचक इतिहास हैं।

पांच हजार से अधिक दुकानों में  फैला है विशाल क्लॉथ मार्केट:-

    लगभग सौ साल पुराना एम टी एच,महाराजा तुकोजी राव होलकर क्लॉथ मार्केट दिल्ली के चांदनी चौक की तरह ही ऐतिहासिक बाजार रहा है।तब इंदौर की सातों मिलें बेशुमार कपड़ा उत्पादन करती थीं और हुकुमचंद जैसे अमीर सेठ अंग्रेजों को उधर देते थे।इंदौर के विकास की नींव हैं यहां की मिलें और कपड़ा उद्योग।हजारों करोड़ का टर्न ओवर था तब,,आज भी लगभग 5000 कपड़ों की दुकान हैं जो राजबाड़ा के पीछे ही ,शीतला माता बाजार और नालियां बाखल आदि बाजार तक फैली हुई हैं।आजादी के पहले से इस क्लॉथ मार्केट के कपड़े देश विदेश तक प्रसिद्ध थे।  1922 में इस मार्केट की स्थापना होलकर स्टेट में हुई थी और हुकुमचंद मिल का सूती कपड़ा बेहद लोकप्रिय था।कपास की प्रसिद्ध मंडी था इंदौर। 1960में भीषण आग लगने से यह मार्केट खाक हो गया था। इसका पुनरोद्धार किया गया था।आज भी सदियों और कपड़ों के लिए पूरे मालवा के लोग इस मार्केट में ही आते हैं।  

हजारों खजूरों के  पेड़ों की जगह हजारों पुस्तकों का बाजार बना खजुरी बाजार  :- 

   इंदौर का खजुरी बाजार एक ऐसी दुनिया है,जिसने लाखों लोगों को पिछले 75 साल में  फर्श से  अर्श तक के मुकाम तक पहुंचाया।नर्सरी से लेकर आई आई टी, आई आई एम, आई आई एस, पी एस सी  स्पर्धाओं  की हजारों पुस्तकें यहां से ले कर मालवा के सैकड़ों लोगों ने अपनी किस्मत बनाई है। 40से 50लाख पुस्तके यहां उपलब्ध हैं।दिल्ली के दरियागंज की तरह यह इंदौर के स्कॉलर्स का दिल है।आधी कीमत में मिलने वाली पुस्तकों से यह बाजार कई दशकों तक रौनक बिखेरता रहा।आज की बेहिसाब कीमती पुस्तकों के मायाजाल से अलग इस बाजार का अतीत लाखों गरीब वंचित,मध्यम वर्ग के लिए बड़ा सहायक था।अभिभावकों पर बोझ कम ही जाता था।अखबारों की पुरानी से पुरानी प्रतियां भी यहां मिल जाया करती थीं।संदर्भ विभागों के लिए और शोध अनुसंधान के लिए मैंने खुद ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पुस्तकें खरीदी थी। आज जो 70/80साल के वृद्ध नागरिक इस बाजार में जाते हैं तो उन्हें अपना बचपन साक्षात् नजर आने लगता है।इंदौर से निकले सैकड़ों होनहार विद्यार्थी जो आज बड़े बड़े ओहदे पर हैं,देश विदेश में हैं,वो ये कभी भूल नहीं सकते कि उनकी योग्यता में इस बाजार ने सीढ़ियों का काम किया है...,,!!!!खजुरी बाजार यूं तो खजूरों का बैग हुआ करता था लेकिन यहां रहने वाले जागीरदार, राव राजा जसवंत सिंहजी खजुरी की जागीर के थे इसलिए इसका नाम खजुरी बाजार पड़ा।

 पैम स्लेट पट्टी लेकर स्वरूप ब्रदर्स के नाम से आई पहली दूकान:-

     पहली दुकान स्वरूप ब्रदर्स की थी,जिसमें पेम,स्लेट पट्टी,स्याही,पेंसिल मिलते थे।दीनानाथ डिपो ने आधी कीमत  में पुस्तकों का व्यापार शुरू किया जो खूब चला ।भैया स्टोर्स,नवयुग डिपो,रघुनाथ की दुकान इस पुस्तक मोहल्ले की शान थे।कालांतर में 400दुकानें खुल गई,प्रकाशन शुरू हो गए, बही ,खाते,क्राफ्ट,अनसोल्ड पेपर्स के लिए यह बाजार प्रसिद्ध हो गया।कई डॉक्टर्स,इंजीनियर,प्रोफेसर्स,शिक्षक,आई पी एस,पत्रकार,कलाकार,साहित्यकार इस बाजार को अपना महान कोचिंग,लर्निंग सेंटर मानते हैं।यहां महादेवी वर्मा,निराला,अमृतलाल नागर,शिवमंगल सिंह सुमन,नीरज, डॉ वेद प्रताप वैदिक,प्रभाष जोशी,शरद जोशी,राजेंद्र माथुर,आलोक मेहता जैसी हस्तियां आती रहीं,,,,और भी लोग आए ,लेकिन पास ही सराफे के व्यंजनों ने उन्हें पुस्तकों से ज्यादा लुभाया,,,,वो बार बार इंदौर आया।