यूं ही कोई संतोष चौबे नहीं हो जाता  :- डॉ प्रदीपसिंह राव

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यूं ही कोई संतोष चौबे नहीं हो जाता  :- डॉ प्रदीपसिंह राव

यूं ही कोई संतोष चौबे नहीं हो जाता  :- डॉ प्रदीपसिंह राव

Update24x.in:- 

रतलाम । रतलाम के लिए संतोष चौबे का नाम अपरिचित नहीं है। वे पिछले 40सालों से रतलाम और जिले के गांव गांव तक साक्षरता, विज्ञान जागृति,नाटक,संगीत,हिंदी भाषा और कंप्यूटर शिक्षा केवलख जागते आए हैं।परिवर्तन चौहान के बहुमान में विगत दिनों रतलाम प्रवास के दौरान मुलाकात में उनकी भारतीय संस्कृति की  वैश्विक संचार और सांस्कृतिक आदान प्रदान की विराट प्रकल्पनाओं से  सरोकार हुआ।

1984 में जब मैं उनसे,दुर्ग,बस्तर में मिला तब वे किसी विलक्षण अभियान में लगे थे। 1985में उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ कर AISECT (आल इंडिया सोसायटी फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर टेक्नोलॉजी)की स्थापना के  आजाद भारत में पहली बार शहरों और गांवों के बीच डिजिटल ज्ञान व विजयन की खाई को पाटने का काम किया।कम्प्यूटर की शिक्षा सरल हिंदीकरण कर गांव गांव में अलख जगा दी।तब लगा कि उनका ये प्रयास हारा हुआ जुआ सिद्ध होगा।लेकिन उनकी और टीम के अथक परिश्रम ने उन्हें इस प्रयासबका बेताज बादशाह बना दिया।

डिजिटल साक्षरता में वे देश के अग्रणी प्रचारक गुरु बन गए।उनके इस नेटवर्क में क्षेत्रीय भाषाओं को भी जोड़ा और इस शिक्षा ने जो कौशल विकास किया उससे सालों पहले ही ग्रामीण पिछड़े आदिवासी इलाकों में रोजगार की बुनियाद मिलने लगी।सामाजिक उद्यमिता के राष्ट्रीय शिक्षा मिशन 2020 के पहले ही संतोष चौबे ने जैसे आधारशिला रख दी थी।

ग्रामीण वंचित युवाओं में डिजिटल शिक्षा की जागृति आ चुकी थी।शिक्षा काव्सक्षरता के साथ कौशल विकास और रोजगार से जोड़ कर अपने कई उच्च शिक्षा संस्थान और विश्वविद्यालय खोल दिए जो दुर्लभ और असाध्य कार्य होता है।आज 28राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में 635से अधिक ज़िलों में 58000 से ज्यादा कौशल सेवा,वित्तीय समावेशन/सूचना केंद्र हैं।अब तक 80लाख के लगभग युवा इस मिशन से जुड़ कर आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो चुके हैं।2019 में श्री चौबे ने" विश्वरंग" की स्थापना कर के भारत की साहित्य,कला,संस्कृति का ऐसा वैश्विक मंच बना दिया जो  बहु सांस्कृतिक विरासत का उत्सव पूरे विश्व में मनाता है।

मॉरिशस में 21देशों के 300 से अधिक प्रतिनिधियों  ने भाग लिया।हाल ही में कोलंबो में वैश्विक चर्चा इस मंच पर हुई और अब भोपाल में वैश्विक सम्मेलन होने जा रहा है।सैन्य स्तर पर साहित्य कला के  उत्थान  के लिए  "वनमाली सृजन "केंद्र स्थापित किए।देश में 100 से अधिक बहुसांस्कृतिक केंद्रों में गतिविधियां संचालित हो रहीं।उनकी दूरदर्शिता, ज्ञान,साहित्यिक साधना,शैक्षणिक मार्गदर्शन का उद्देश्य एक बेहतर भारत से भी आगे संस्कृति की महाशक्ति बनाने का सपना है,वो कहते हैं कि भारत ने बंदूक,सेना,आक्रमण से नहीं अपनी सांस्कृतिक विरासत और शांति, सौहार्द और बंधुत्व के आचरण से दूसरे देशों का दिल जीता है।देश के अंतिम छोर तक जब इस विज्ञान, कला कौशल और बंधुत्व,सदाचार  का विस्तार हो जाएगा तो भारत को कभी कोई देश पराजित न कर सकेगा क्यों कि बदलते बहुआयामी वैश्विक शक्ति केंद्रों की  बदलती दुनिया  में बुद्ध ,गांधी,विनोबा,विवेकानंद, और महावीर  जैसी अनेक विभूतियों की  विरासत का यह भारत  शांति सहिष्णुता की अकूत संपदा रखता है।सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विकास के साथ कौशल विकास को बढ़ावा देती उनकी  अनूठी विश्व पुस्तक यात्रा का ज्ञानरथ अनवरत चल रहा है!!और कोई क्या अपेक्षा कर सकता है इस विराट व्यक्तित्व से जो जितना बड़ा,उतना  ही सहज सरल विनम्र,इसीलिए कोई यूं ही "संतोष" नहीं बन जाता।