सराफा की दुकानों की प्रतिदिन की आय 10करोड़  से अधिक:यहां  कभी सिक्के ढालने और तलवारों के कारखाने थे(डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ इतिहासकार)।

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सराफा की दुकानों की प्रतिदिन की आय 10करोड़  से अधिक:यहां  कभी सिक्के ढालने और तलवारों के कारखाने थे(डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ इतिहासकार)।

 सराफा की दुकानों की प्रतिदिन की आय 10करोड़  से अधिक:यहां  कभी सिक्के ढालने और तलवारों के कारखाने थे(डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ इतिहासकार)।  

Update24x.in:-

रतलाम।   इंदौर  के बाजारों की रौनक पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।पिछली बार आपने पढ़ा था कि क्लॉथ मार्केट के बाद किस तरह खजुरी बाजार में लाखों पुस्तकों का साम्राज्य स्थापित हुआ। 17वी शताब्दी में विकसित राजबाड़ा का सैकड़ों वर्षों का वैभव आज भी वैसा ही है।इंदौर की धड़कन ही राजबाड़ा है और सारे व्यापार इसके आसपास की रौनक हैं।आज यहां का व्यापार 10करोड़ से अधिक प्रतिदिन होता है।    

  रात होते ही व्यंजनों का स्वर्ग बन जाता है सराफा  :-

   दिन में सोना चांदी,कपड़े,पुस्तकें तो रात को सराफा व्यंजनों का स्वर्ग बन जाता है।नईदुनिया,इंदौर समाचार,नवभारत स्वदेश और फिर भास्कर ने,इतिहास और संदर्भ,से रोचक जानकारियां पाठकों को लगातार दीं।जो संदर्भ विभागों,संग्रहालयों में मिलती हैं।सराफा न सिर्फ आम लोगों के स्वाद का केंद्र बिंदु रहा अपितु यहां पत्रकारों ने बड़ी बड़ी खबरों पर चिंतन किया,मंथन किया।  

   पहले पत्रकार यहां के व्यंजन खाते,फिर प्रेस जाते :-

    सराफे के पुराने दुकानदार बुजुर्ग बताते हैं की इसी  राजबाड़ा की  चाट की   चौपालों से रोचक खबरें निकाल कर सुर्खियों में  दूसरे दिन प्रकाशित  की जाती थी,उनके पास ब्रेकिंग न्यूज सबसे पहले आ जाती,लेकिन तब मोबाइल  न थे,!!!दही बड़े,भुट्टे का कीस,मालपुआ,जलेबी, रबड़ी, पेटिस और गर्मियों में कुल्फी की चुस्कियां आपके भी मुंह में पानी ला रही होगी।(,अकबर के जमाने में हिमालय के बर्फ से बनती थी कुल्फियां) आईने अकबरी में उल्लेख है कि हिमालयीन बर्फ से अकबर के जमाने में भारत में कुल्फी का प्रचलन हुआ।अबुल फजल लिखते हैं कि मुगल  पाकवशाला में  दूध को उबालकर  गाढ़ा कर धातु के शंकु में भरकर  नमक और बर्फ  के घोल में जमाया जाता था।पानी को जमाने के लिए साल्ट पीटर (,पोटेशियम नाइट्रेट )का उपयोग होने लगा था ।पारसी शब्द कोश में "कुल्फी,qulfi" का अर्थ ," ढ़ंका हुआ प्याला "होता है!एनडीटीवी और द हिंदू के पोर्टल पर भी इसका इतिहास मिलता है।  

 लाला अग्रवाल की प्रसिद्ध महू की कुल्फी:-       

 कुल्फी होलकर युग में भी प्रचलित थी और ,1930 में लाला अग्रवाल, महू की कुल्फी का इतिहास मिलता है।मावा,शुद्ध केसर,पिस्ता की मटका कुल्फी कई पीढ़ियों तक प्रसिद्ध रही है।बाद में आजादी के बाद इंदौर में कुल्फी की होड़ लगती गई। सराफे में 1960तक कुल्फी चर्चित हो गई।1965 की प्रकाश,बंटी यादव की कुल्फी की दुकान पुश्तैनी है।रबड़ी,फालूदा,मटका कुल्फियां पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही हैं।अब तो 24कैरेट सोने की परत की  "गोल्ड कुल्फी" आ गई हैं।जो हजारों रुपयों में बिकती हैं।  

रजवाड़े के ठीयों  से  प्रेस क्लब तक का सफर:-

  अब गर्मी की रातों में शाम होते ही युवा पत्रकारों का हर दिन सिटी हार्ट ,घंटाघर,राजबाड़ा या मल्हारगंज चौराहे पर मिलना तय रहता था।जमाना गन्ने के रस का सौ साल से प्रचलित है।साथ स्वादिष्ट स्वास्थ वर्धक,,इसलिए पत्रकारों ने हर चौपाल पर इंदौर को चिंतन की बेमिसाल  सौगातें दी हैं।प्रेस क्लब तो बाद में आए।  राहुल बारपुते,प्रभाष जोशी,माणकचन्द लाल मामाजी,शरद जोशी,डॉ बल्लभ  माचवे,अजीत प्रसाद जैन,दिनेश मिश्र, डॉ वेद प्रताप वैदिक,जवाहर चौधरी जैसे अनेक मूर्धन्य विचारकों पत्रकारों के तपोबल से इंदौर स्मरण भारत में चर्चित हो गया।लेखन और प्रखर पत्रकारिता की उर्वरता ने इंदौर को विश्व मानचित्र पर दैदीप्यमान कर दिया। 1957/58से ही  इंदौर की पत्रकारिता एक संगठन  की परिकल्पना की राह पर थी।जिसे मुख्यमंत्री भगवंत मंडलोई ने 65 वर्ष पूर्व इंदौर प्रेस क्लब की सौगात बड़े कर फलीभूत कर दिया।(अगली बार,प्रेस क्लब की शुरुआती यात्रा,और इंदौर के इतिहास की और रोचक बातें)

 1874के बाद इंदौर व्यापार का चर्चित केंद्र बन गया। 1880 में बैलगाड़ियों और घोड़ों से सराफा में कपास और अफीम का सामान लाया जाता था।सेठ हुकुमचंद सबसे बड़े व्यापारी थे सराफे के विकास में वो मील का पत्थर थे।मालवा,निमाड़ ही नहीं देश भर के व्यापारी छोटे सराफे आते और चीन तक अफीम का व्यापार फैला हुआ था(,अंसारी,संग्रहालय)अफीम कपास और चांदी के व्यापार के लिए हुंडी (1930)का प्रचलन था।