इंदौर का बुजुर्ग शास्त्री ब्रिज और बूढी सराय इतिहास की साक्षी हैं (डॉ प्रदीपसिंह राव)
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इंदौर का बुजुर्ग शास्त्री ब्रिज और बूढी सराय इतिहास की साक्षी हैं (डॉ प्रदीपसिंह राव)
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रतलाम । प्रसिद्ध अंग्रेज शोधार्थी कर्नल टॉड,इतिहासकार रघुवीरसिंह जी,होलकर संग्रहालय से तो इंदौर की कई दुर्लभ ऐतिहासिक जानकारियां मिलती ही हैं,लेकिन नईदुनिया इंदौर के पितृपुरुष पत्रकार स्व अभय छजलानी शीट अनेक पत्रकारों ने भी इंदौर के इतिहास का सारगर्भित वर्णन किया और प्रकाशित किया था।भोपाल के सप्रे संग्रहालय, इतिहासकार जफर अंसारी और शोध ग्रंथों साथ ही किंवदंतियों और उपलब्ध दस्तावेजों की माने तो अनेक बातें इंदौर की आन , बान ,शान का गुणगान करती हैं। पिछले किस्सों में आपने यह तो जान ही लिया था कि किस तरह इंदौर में रेल की शुरुआत हुई।और तभी से इंदौर ने करवट बदली और समृद्धि की इबारतें लिखना शुरू किया।
रेल यात्री और रुकने के लिए पहली सराय:-

रेल तो आ ही गई लेकिन यात्री किधर ठहरें,,उन्हें स्टेशन पर उतरते ही सराय का इंतजाम भी करना था।होलकर घराने के समय से ही रानी सराय की स्थापना कर दी गई थी जो अनेक ऐतिहासिक गतिविधियों की साक्षी बनी।इसका निर्माण 1907में महाराजा शिवाजी राव होलकर की पत्नी वाराणसी बाई द्वारा करवाया।मुगल शैली में निर्मित इस सराय को रानी सराय रखा गया ।इंदौर को सुनियोजित नगर बनाने के लिए इंग्लैंड से प्रख्यात नगर नियोजक पैट्रिक गिडिज को बुलवाया गया था।उन्होंने होलकर कॉलेज,फूटी कोठी,गांधी हॉल,शिव विलास पैलेस,मोती बंगला आदि शानदार धरोहर बनाई थीं।आगे चलकर 1907में न्यू वाराणसी बाई होलकर रानी सराय का निर्माण,तुकोजीराव होलकर तृतीय के समय पूर्ण हुआ। वास्तुविद चार्ल्स स्टीवंस ने इसे सुंदर स्वरूप प्रदान किया था। यह सराय इंदौर का प्रमुख व्यावसायिक सांस्कृतिक केंद्र बन गई।यहां मराठी ,हिंदी नाटकों का मंचन होता रहता था।प्रमुख मीना बाजार बन गया था राज परिवार खुद आकर खरीदी करते थे।
जब महात्मा गांधी आए आए रानी सराय:-

1935में हिंदी साहित्य सम्मेलन के 24वें राष्ट्रीय सम्मेलन में जब गांधी जी आए तो रानी सराय के परिसर में ही उनकी सभा हुई थी जो ऐतिहासिक थी।इंदौर की प्रगति की रानी सराय, एक बुनियाद बन गई। उसी समय में व्यापार और परिवहन के लिए इंदौर का यह रेल मार्ग बहुत काम आने लगा।लेकिन तब कोई ब्रिज न होने से रेल पटरियों को पैदल पार करके इधर उधर जाना होता था।नगर का अधिकांश व्यापार रानीसराय की तरफ ही होता।
इंदौर का पहला रेलवे ओवर ब्रिज का निर्माण :-

आजादी के बाद रेलवे ने शास्त्री ब्रिज का निर्माण शुरू कियाऔर 4/5साल के अथक परिश्रम के बाद 1952में ब्रिज का परीक्षण हुआ और फिर लगभग एक करोड़ की लागत से बने इस ब्रिज का 12जन 1953को लाल बहादुर शास्त्री ने इसका उद्घाटन किया।तब यह बहुत बड़ा लगता था क्यों कि गिनती के मोटर वाहन थे,ज्यादातर साइकिलें, घोड़ा गाड़ी और बैलगाड़ियां ही गुजरती थीं।इसकी बनावट इतनी खूबसूरत थी कि इंदौर के लोग इसपर से गुजरते हुए अपनी शान समझते थे।आती जाती रेलों को देखना चहकती चिड़िया के झुंड,ठंडी ठंडी हवा का अहसास सब कुछ निराला था,, बीते वर्षों में इस पुल से बड़ी बड़ी हस्तियां गुजरी हैं, इंदौर में ब्याही नई दुल्हन को इस ब्रिज पर घुमाने लाना बड़ा रोमांटिक लगता था।
शास्त्री ब्रिज बन गया था इंदौर की व्यापारिक चमक का केंद्र बिंदु :-

कालांतर में तो इसके आसपास ही एक से एक टॉकीजों की रौनक हो गई।,रीगल,यशवंत, बेमबिनो मधु मिलन,,सिनेमा और पृथ्वीराज से लेकर रणवीर कपूर तक की फिल्मों के दर्शक शास्त्री ब्रिज को भी न भूले। रीगल चौराहा तो,कानूनी, राजनीतिक,सामाजिक और पत्रकारिता की चर्चा के लिए प्रसिद्ध हो गया। नेहरू पार्क जाना हो या स्विमिंग पूल,इसी ब्रिज का मार्ग था।समय किसी के लिए रुकता है क्या,,,,!! 72साल हो गए,,,शास्त्री ब्रिज की नींव को भी इंदौर के बदनाम चूहों ने नहीं छोड़ा,एक किनारा खोखला कर दिया।
बूढ़े ब्रिज को जमीदोज कर बनेगा सिक्स लेन नया ब्रिज

अब इसका पुनर्निर्माण होने जा रहा है।आधुनिक इंदौर का आधुनिक ब्रिज।जो इंदौर की सूरत और सीरत ही बदल देगा। वर्तमान ऊंचाई से डबल ऊंचाई और चौड़ाई के साथ बनेगा ब्रिज,इसके कारण आर एन टी मार्ग का भी बड़ा हिस्सा अपनी तस्वीर बदल लेगा।लगभग डेढ़ साल बाद नया ब्रिज इंदौर को सुनियोजित सौगात दे देगा।लागत आएगी लगभग 142करोड़। यानी इसकी 72साल पहले की लागत से 139करोड़ अधिक।प्रगति की एक और उड़ान।