अमेरिका ने जिस देश में हाथ डाला,निराशा से पड़ा पाला (डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषक)
latestnews--hindi-samachar-ratlamnews-390
अमेरिका ने जिस देश में हाथ डाला,निराशा से पड़ा पाला (डॉ प्रदीपसिंह राव, वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषक)
Update24x.in:-
रतलाम। पिछले 53 साल से अमेरिका ने जिधर भी ,जिस देश में हस्तक्षेप किया,,मुंह की खाई,,। 1945 में द्वितीय युद्ध की समाप्ति अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए "परमाणु बम" की अमानवीय त्रासदी के साथ समाप्त हुई। हजारों बेकसूरों की जाने चली गई।उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रूमैन ने शीत युद्ध में सोवियत संघ से कभी निर्णायक जीत हासिल न की।
साम्यवाद का भूत और असफल रणनीति:-

साम्यवाद की समाप्ति के लिए सब कुछ दांव पर लगाया और उसकी चपेट में कई देश आते गए। 1950 के दशक में साम्यवाद को रोकने की जिद में उत्तरी वियतनाम के साम्यवादी"हो ची मिन्ह" के नेतृत्व को दबाने में दक्षिण वियतनाम का समर्थन करने लगा।उसे डर था कि दक्षिण एशिया के अन्य देश,(लाओस,कंबोडिया) भी साम्यवादी न बन जाएं।अमेरिका ने लगभग 31लाख सैनिक वियतनाम में उतार दिए थे।लेकिन उत्तरी वियतनाम की सटीक गुरिल्ला युद्ध नीति के आगे अमेरिका की एक न चली।उसके 58,279 सैनिकों को वियतनामी गुरिल्ला सैनिकों ने मार डाला।राष्ट्रपति जॉनसन की नीति फेल हो गई।168अरब डॉलर खर्च करके भी वियतनाम युद्ध में अमेरिका की हार हुई और उसे 1973 में वापस खाली हाथ लौटना पड़ा।वियतनाम में साम्यवादी सरकार बन गई।
युद्ध जीतने की विफलता का आज भी तनाव :-

युद्ध जीतने की विफलता ने "अमरीकी सैन्य अजेयता"के मिथकों को तभी ध्वस्त कर दिया था।फिर भी अमेरिका ने कभी सबक न लिया आगे चलकर कई गलतियां ऐतिहासिक भूल बनती गई। साम्यवाद का पिशाच उसे डराता सताता रहा। 1962 में भारत चीन युद्ध में चुप रहना, 1965 के युद्ध में भारत का साथ न देना,खाद्यान्न न देने की धमकी देना।शास्त्री जी द्वारा दो टूक जवाब,फिर 1971में पाकिस्तान के समर्थन में रहना, सातवां बेड़ा तैयार रखना, वैश्विक संघ का भारत को साथ देना।और 1979/80 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध असफल लंबा प्रयास करना,और आतंकवादी पाकिस्तान को अरबों डॉलर से खतरनाक देश बना देना,तालिबानों का जन्म और अफगानिस्तान की जंग में अमरीकी सैनिकों की फजीहत होना,9/11 को वर्ल्ड ट्रेड पर आतंकी हमला ,फिर अफगानिस्तान में अ मरिकी सैनिकों का पड़ाव होते हुए इस देश को तालिबानियों का बनने से न रोक पाना ,,इराक ईरान युद्ध में ईराक के पक्ष में अरबों डॉलर खर्च कर देना,,और इन युद्धों में हजारों अमरीकी सैनिकों की जान गंवा देना अमेरिका जैसे धनी,लोकतांत्रिक देश की हठधर्मिता की हद है।
अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का लगातार उल्लंघन:-

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को जबरन पकड़ लाना क्या अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन नहीं है,यह चिंतन का विषय है। खमेनेई की हत्या और एकतरफा युद्ध करके खाड़ी के सभी देशों सहित दुनिया को आर्थिक संकट में झोंक देना,,क्या ट्रंप की बे लगाम सनक नहीं है।पिछले सात दिनों से दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति अमेरिका, निर्भीक ईरान की इच्छाशक्ति और उसके जज्बे को झुका न सकी है।ईरान की इमारतें खंडहर कर दी गई हैं लेकिन ईरान का मनोबल आज भी चट्टान की तरह अमेरिका को धता बता रहा है,,,,।लगता है इस युद्ध में अमेरिका को ईरान में मलबों ,लाशों के अलावा जीतने के लिए कुछ बचा ही नहीं है...!!!