गंगा_जमुनी तहजीब ही धार के धैर्य की परीक्षा है:- (डॉ प्रदीपसिंह राव,वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक) 

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गंगा_जमुनी तहजीब ही धार के धैर्य की परीक्षा है:- (डॉ प्रदीपसिंह राव,वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक) 

गंगा_जमुनी तहजीब ही धार के धैर्य की परीक्षा है:- (डॉ प्रदीपसिंह राव,वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)  

Update24x.in:-

   रतलाम :- इन दिनों समूचे भारत में राष्ट्रवाद की लहर में हिंदूवादी नाव हिलोरे ले रही है।अयोध्या में  विवादित बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद राममंदिर का निर्माण होने से राष्ट्र का इतिहास सांस्कृतिक पुनर्संरचना की ओर मुखर हो गया है। धार की भोजशाला का ऐतिहासिक प्रमाण भी यह सिद्ध करता है कि 1035 ईस्वी में तत्कालीन राजा भोज(1000/1055) द्वारा बसंत पंचमी के दिन वाग्देवी, सरस्वती जी की मूर्ति स्थापित की गई( जो अब लंदन म्यूजियम में रखी हुई है!

लगभग तीन शताब्दियों तक हुई है पूजा  :-:-

यहां 271वर्षों तक पूजा अर्चना होती रही। राजा भोज ने इसे शिक्षा का उत्कृष्ट केंद्र बनाया,यहां आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय बनाया जो नालंदा,तक्षशिला की तरह प्रतिष्ठित रहा।इसके प्रमाण आज भी हैं और संस्कृत की ऋचाएं आज भी दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। 1305ईस्वी में  अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद खंडित किया गया और 1551में मंदिर को मस्जिद और मकबरा बनाने की मुहिम शुरू हो गई।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण(ASI)  के संरक्षण में  में है यह अभी।  

 दो शताब्दियों से विवादित यह :-

प्रार्थना स्थल 19वो शताब्दी से दोनों धर्मों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है। हर मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ हिन्दू करते हैं,जबकि हर शुक्रवार को जुम्मे की  नमाज पढ़ने मुस्लिम आते रहते हैं।अभी तक तीन बार बसंत पंचमी शुक्रवार को  पढ़नेेे से तनाव हुआ है।    सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा निर्णय के अनुसार अब बसंत पंचमी के दिन दोनों ही समूहों को अर्चना,इबादत की अनुमति दी गई है।दोनो के समय को विभाजित किया गया है ।यह भारतीय संस्कृति की गंगा _जमनी तहजीब के अनुकूल एक बेहतर निर्णय लिया गया है।जिसे दोनो ही समुदाय को बिना तनाव के स्वीकारना चाहिए।  

  बहुत कठिन है चुनौती प्रशासन के लिए:- 

     हालांकि यह दिन मध्यप्रदेश के  मुख्य मंत्री मोहन यादव  के लिए बड़ी चुनौती हैऔर धार की भोजशाला को चाक चौबंद करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है।भोजशाला की सीमा में ही चार गुंबजदार मकबरे भी बने हुए हैं,जिनमें मूलमौलाना कमालुद्दीन चिश्ती धारवी(1238/1330)की दरगाह सबसे पुरानी है और मुस्लिमधर्मी यहां नमाज पढ़ते आए हैं।भारत में यह अनूठी तहजीब सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।विवाद का कारण प्रार्थना का स्थान एक ही होना है।यह बहुत ही शांति पूर्वक सम्पन्न हो सकता है ऐसी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है और कहा है कि दोनों धर्मों को अलग अलग समय में प्रार्थना,इबादत करना चाहिए।समय भी निर्धारित है और अधिकृत संख्या और आइडेंटिटी पास भी बनाए जाने के निर्देश है।यह सब स्थानीय,प्रदेश प्रशासन के जिम्मे है।सुरक्षा के कड़े प्रबंधों ने भोज शाला और पूरे धार को "आयरन अंब्रेला"की छावनी में तब्दील कर दिया है ।एक शुभ पर्व पर सामाजिक समरसता के साथ  बिना हिंसा और विवाद के प्रार्थना,इबादत पूर्ण कर लेना चाहिए। दोनों धर्मों के अनुयायियों को अपना दिल इस दिन बड़ा रखना चाहिए़।यही वसंत उत्सव की सार्थकता है।